आज नगरों और ग्रामों में, वनवासी और पर्वतीय क्षेत्रो में झुग्गी-झोपड़ियो में, शिशु वाटिकायें, शिशु मन्दिर, विद्या मन्दिर, सरस्वती विद्यालय, उच्चतर शिक्षा संस्थान, प्रशिक्षण केन्द्र और शोध संस्थान है। इन सरस्वती मन्दिरों की संख्या, विद्यालयों में छात्रो की संख्या और आचार्यो की संख्या निरन्तर बढ़ रही हैं।
भारतीय संस्कृति एवं जीवनादर्शों के अनुरूप शिक्षा दर्शन विकसित करना जिससे अनुप्राणित होकर शिक्षा के लिये समर्पित कार्यकर्ता राष्ट्र के पुनर्निमाण के पावन लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में विश्वासपूर्वक बढ़ सकें।
शारीरिक, योग, संगीत, संस्कृत तथा नैतिक एवं अध्यात्मिक शिक्षा के राष्ट्रीय पाठ्यक्रमों, सहपाठ्य क्रियाकलापों एवं अनौपचारिक शिक्षा के आयोजनों से छात्रो में राष्ट्रीय एकता, चारित्रिक एवं सांस्कृतिक विकास को सुदृढ़ करना।
विश्व के आधुनिकतम ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी उपलब्धियों का पूर्ण उपयोग करते हुए ऐसी शिक्षण प्रणाली एवं संसाधनो को विकसित करना है जिससे छात्रों के सर्वांगीण विकास के शैक्षिक उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति सुलभ हो सके।
शिक्षा का ऐसा स्वरूप विकसित करना जिसके माध्यम से भारत की अमूल्य आध्यात्मिक निधि, परम सत्य के अनुसंधान में पूर्व पुरुषों के अनुभव एवं गौरवशाली परंपराओ की राष्ट्रीय थाती को वर्तमान पीढ़ी को सौंपा जा सके और उसकी समृद्धि में वह अपना योगदान करने में समर्थ हो सके।
विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रवाद पर आधारित शिक्षा प्रणाली का प्रमुख संस्थान है। इसकी नींव 1952 में गोरखपुर के पक्कीबाग़ में पहले “सरस्वती शिशु मंदिर” के रूप में रखी गई, जो संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान करने का केंद्र बना। 1958 में शिशु शिक्षा प्रबंध समिति का गठन हुआ, और 1977 में इसे अखिल भारतीय पहचान मिली, जिससे विद्या भारती देश का सबसे बड़ा गैर-सरकारी शिक्षा संगठन बन गया। यह संगठन राष्ट्रवादी शिक्षा, संस्कार, योग, संगीत, और चरित्र निर्माण को प्राथमिकता देता है। विद्या भारती भारतीय शिक्षा दर्शन को समृद्ध करने के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को भी बढ़ावा देती है।
© २०२५ विद्या भारती कानपुर प्रान्त